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कुलार्णव • अध्याय 17 • श्लोक 11
स्वान्तः शान्तिसमुन्मीलत्परतत्त्वार्थचिन्तनात् । मिथ्याज्ञानविहीनत्वात् स्वामीति कथितः प्रिये ॥
हे प्रिये! स्व (अपने) अन्तःकरण में शान्तिपूर्वक परतत्त्व का चिन्तन करते रहने से और मिथ्या ज्ञान से रहित होने के कारण 'स्वामी' कहा जाता है।
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