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कुलार्णव • अध्याय 17 • श्लोक 26
योनिमुद्रानुसन्धानात् गिरिजापादसेवनात् । निर्लीनोपाधिविभवाद् योगिनीत्यभिधीयते ॥
योनिमुद्रा का अनुसन्धान करने से, गिरिजा के चरणों की सेवा करने से और उपाधि, वैभवों को निलींन (रहित) करने से 'योगिनी' कहलाती है।
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