शिष्य को ही वह आचारवान् नहीं बनाता, अपितु स्वयं भी वैसा आचरण करता है और संसार में शास्त्रों के अर्थों को चुनकर वह उनका भावार्थ स्पष्ट करता है। अतः उसे आचार्य कहते हैं। समीप में आए स्थावर या जङ्गम जिस किसी को भी जो शिक्षा देता है तथा यम नियम आदि योग का उसे अभ्यास रहता है। इसी से वह 'आचार्य' कहा जाता है।
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