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कुलार्णव • अध्याय 17 • श्लोक 61
पानाङ्गविश्वरूपत्वात्त्रिचतुष्ककलाश्रयात् । पतितत्राणनाद्देवि मा पात्रमित्यभिधीयते ॥
हे देवि! संसार में पान करने का अङ्गभूत होने से, त्रि (तीन) और चार कलाओं का आश्रय करने से तथा पतितों का त्राण (उद्धार) करने से 'पात्र' कहलाता है।
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