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कुलार्णव • अध्याय 17 • श्लोक 25
शरीरमर्थं प्राणांश्च सद्‌गुरुभ्यो निवेद्य यः । गुरुभ्यः शिक्षते योगं शिष्य इत्यभिधीयते ॥
जो अपने शरीर, अर्थ (धन) और प्राणों को सद्‌गुरु को अर्पित कर योग की शिक्षा ग्रहण करता है, वह 'शिष्य' कहा जाता है।
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