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कुलार्णव • अध्याय 17 • श्लोक 81
पञ्चाङ्गोपासनेनेष्टदेवता प्रीतिदानतः । पुरश्चरति भक्तस्य तत् पुरश्चरणं प्रिये ॥
पञ्चाङ्ग उपासना द्वारा इष्टदेवता की प्रीति देने से जो भक्त के 'पुरः' (आगे) 'चरति' (चलता) है, हे प्रिये! वह 'पुरश्चरण' कहा जाता है।
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