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कुलार्णव • अध्याय 17 • श्लोक 15
भवपाशप्रशमनात् टङ्कारेन्दुकशेखरात् । रक्षणात् कमनीयत्वात् भट्टारक इतीरितः ॥
भव (संसार) बन्धन को शान्त करने से, टकार अर्थात् इन्दु (चन्द्र) शेखर होने से और रक्षा करने से तथा कमनीय (सुन्दर) होने के कारण 'भट्टारक' कहा जाता है।
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