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अध्याय 1 — प्रथमोपदेश

घेरण्ड संहिता
61 श्लोक • केवल अनुवाद
एक बार चण्डकापालि नाम के एक योगी घेरण्ड नामक एक दूसरे योगीराज की कुटी में जाकर विनय से भक्ति सहित प्रणाम करके घरेण्ड ऋषि से पूछने लगे।
वे बोले - हे योगेश्वर! जो तत्त्व ज्ञान का कारण है तथा शरीर में स्थित योग है, उसे मैं इस समय सुनना चाहता हुँ । हे स्वामिन्‌! हे योगेश्वर! यह मुझे (कृपा करके) बताइए।
तब घेरण्ड ऋषि ने कहा - हे विशालबाहो! बहुत अच्छा, तुम्हे बहुत साधुवाद है - धन्यवाद है। तुम जो पूछ रहे हो, उसे मैं तुमसे कहता हूँ, उसे सावधान होकर सुनो।
माया के समान (इस संसार में) कोई पाश नही है, तथा योग से श्रेष्ठ (दूसरा) कोई बल नही है, ज्ञान से श्रेष्ठ अन्य कोई बन्धु नही है और अहंकार से बड़ा कोई शत्रु नही हैं।
जिस प्रकार संसार में क आदि वर्ण या अक्षरों को और अनेक प्रकार के शाख्रों को जाना जाता है, उसी प्रकार योग को ग्रहण करके तत्त्वज्ञान को प्राप्त किया जाता है।
श्रेष्ठ और निम्न कर्मो से प्राणियों का घटरूपी यह शरीर उत्पन्न होता है तथा शरीर रूपी घट से कर्म उत्पन्न होता है, जिस प्रकार कि घटीयंत्र घूमा करता है।
जिस प्रकार घटीयन्त्र गवों (चक्रों) के वश से नित्य ऊपर और नीचे घूमता है, उसी प्रकार कर्म के वश से पुन:-पुन: जन्म और मृत्यु के साथ यह जीव भी घूमा करता है।
यह शरीर रूपी घट कच्चे घड़े में जल भरने के समान सर्वदा गल जाने वाला है । किन्तु योगरूप अग्नि से अच्छी प्रकार तपाकर इस घटरूप, शरीर की शुद्धि को सम्पन्न करना चाहिये।
इसके पश्चात्‌ योग के सात प्रकार के साधन बताते हुए घेरण्ड ऋषि बोले) शोधन, दृढ़ता, स्थिरता, धैर्य, हल्कापन, प्रत्यक्षीकरण तथा निलिप्तता ये योग के शरीर रूपी घट में स्थित सात साधन हैं।
(सातो योग साधनों की व्याख्या करते हुए घेरण्ड ऋषि बोले) प्रथम योग साधन - शोधन छह कार्यों से, योग में दृढ़ता आसनों से, स्थिरता विविध मुद्राओं से और धीरता का भाव प्रत्याहार से होता है।
लाघवता (हल्कापन की स्थिति) प्राणायाम से, तथा ध्यान से स्वयं की आत्मा में प्रत्यक्षीकरण, समाधि से निलिप्तता, और इस प्रकार मुक्ति हो जाती है, इसमें किसी प्रकार का संशय नहीं है।
(योगियों को अत:) धौति, बस्ति, नेति, लौलिकी (नौली), त्राटक और कपालभाति इन छह कर्मों का आचरण करना चाहिये।
(धौति के प्रकार बताते हैं-) प्रथम - अन्तर्धीति, द्वितीय - दन्तधौति, तृतीय - हृद्‌ धौति और चतुर्थ - मूलशोधन इन चार प्रकारीय धौतियों को करके (योगीजन) घट (शरीर) को निर्मल-स्वच्छ करें।
(अन्तर्धौति क्या हैं?) प्रथम - वातसार, द्वितीय - वारिसार (जल का निकालना), तृतीय - अग्निसार और चतुर्थ - बहिष्कृत, इस प्रकार घट (शरीर) को निर्मल करने की चार प्रकारीय अतंर्धौति हैं।
(अब अंतर्धीति का वातसार प्रकार क्या है, यह बताते हैं-) (इसके लिये पहले) काकचंचु (कौवे की चौंच) के समान मुख से (मुख को बनाकर) वायु को शनै:-शनै: पीना चाहिये। पुन: उदर को चलाना चाहिये और मुख से वायु को शनै:-शनै: निकालना चाहिये।
(वातसार का क्या फल है - यह बताते हैं) वातसार क्रिया (योगियों को लाभदायी होने के कारण) अतीव गोपनीय है। यह शरीर को निर्मल करने का कारण है। यह सब रोगों को विनष्ट करने वाली तथा देहाग्नि (जठराग्नि) को बढ़ाने वाली है।
(पुन: वारिसार क्या है - यह बताते हैं) जल को धीरे-धीरे कण्ठ तक पीना चाहिये, पुन: उसे उदर में डुलायें या चलायें और पुन: उस पानी का रेचन अधोमार्ग से कर देना चाहिये या (शौच स्थान या मलद्वार से) निकाल देना चाहिये।
(वारिसार का क्या फल है, यह बताते हैं-) यह वारिसार (नामक अतंर्धौति क्रिया योगियों का विषय होने से) अतीव गोपनीय है। यह देह को निर्मल करने वाली है। अत: इसे प्रयत्नपूर्वक साधना चाहिये। जिससे साक्षात देवताओं के समान देह प्राप्त हो जाती है।
(पुन: अग्निसार अतंर्धीति का अर्थ करते हैं-) नाभि ग्रन्थी (नाभिगाँठ) को सौ बार मेरुदण्ड (रीढ़) से लगाये (अर्थात्‌ पेट को अन्दर खींचना चाहिये । यह क्रिया योगिओं को सिद्धि देने वाली अग्निसार धौति कही जाती है।
(यह अग्निसार धौति) उदर रोगों को दूर करने वाली तथा जठराग्नि को बढाने वाली है। यह क्रिया भी (सबके द्वारा सम्भव न होने से) देवों को भी दुर्लभ है, अतीव गोपनीय है इसी धौंति के नियम मात्र से शरीर देवताओं के समान (सुन्दर हो जाता है)।
काकमुद्रा को शोधकर उदर में वायु का पान करे अर्थात्‌ कोवे जैसा मुख करके वायु को धीरे-धीरे खींचे।
पुन: अर्धयाम (आधे प्रहर) पर्यन्त अर्थात्‌ डेढ़ घन्टे तक उसे उदर में धारण करे और अधोमार्ग (मलद्वार) से बाहर निकाले। यह धौति क्रिया भी (सार्वजनिक न होने से) गोपनीय ही है (अर्थात्‌ योगियों द्वारा की जानी ही संभव है)। (विशिष्ट समीक्षा - यहाँ प्राय: योगक्रियाओं को परं गोपनीया तथा देवों को भी दुर्लभ बताया है। इसका अभिप्राय यही है कि सामान्य जन न तो इन क्रियाओं को करते और न जानते ही हैं। जो बिरले योगीजन हें, मात्र वे ही इन्हें करते और जानते हैं (और इस प्रकार) वे ही मात्र देवदुर्लभ शरीर को प्राप्त करते हैं।)
(प्रक्षालन क्रिया का अर्थ करते हैं-) नाभिमग्न जल में स्थित होकर शक्ति नाड़ी का विसर्जन करना चाहिये । (अर्थात पेट को फुलाये रखना चाहिये तथा) दोनों हाथों से त्रिवलि स्थान को धोना चाहिये, जब तक कि मल का विसर्जन न हो जाये।
तब तक नाड़ी का प्रक्षालन करके पुनः उदर में (त्रिवलि को) बिठा दे (अर्थात्‌ फुलाये हुए पेट को अन्दर कर ले) यह प्रक्षालन की विधि गोपनीय होने से देवों को भी दुर्लभ है (इस प्रकार इस) धोतिमात्र से ही मनुष्यों का शरीर देवदेह के समान (तेजस्वी) हो जाता है।
जब तक अर्द्धप्रहर तक धारणशक्ति को व्यक्ति धारण न कर सके, तब तक महाधौति को न करे, अन्यथा उससे कुछ भी नहीं होता है।
(अब दन्तधौति के प्रकार बताते है-) दन्तमूल (दाँतों की जड़), जिह्वामूल (जिह्वा के मूलस्थान), दोनों कानों के रंध्र (छिद्र), और कपालरंध्र, ये दन्तधौति कहलाते हैं।
खदिर वृक्ष (खैर) के रस से और सूखी (शुद्ध) मिट्टी (पीली) से तब तक दन्तमूल का मार्जन करे, जब तक कि सब किल्बिष (मल) दूर न हो जाये।
(यह) दन्तमूल धौति योगियों के योगसाधन में सर्वाधिक श्रेष्ठ है। योगवित्‌-योगज्ञानी जन को नित्यप्रति प्रभात समय में इसे करना चाहिये। योगियों के धारणीय कार्या (नियमों) में यह दन्तमूल (धौतिक्रिया मुख्य) मानी गयी है।
(पुनः जिह्वाशोधन क्या है, यह बताते हैं-) इसके पश्चात्‌ में जिह्वाशोधन का कारण बताता हूँ। यह क्रिया वृद्धावस्था और रोगादियों को नष्ट करती है, तथा जिह्वा इससे लम्बी होती है।
तर्जनी, मध्यमा और अनामिका इन तीनों अंगुलियों के योग से गले के मध्य-जिह्वा के मूल को घिसना चाहिये। शने:-शने: (इस प्रकार) मार्जन करके कफदोष का निवारण करना चाहिये।
पुनः मक्खन से (जिह्वा का) मार्जन करना चाहिये और पुनः-पुनः दोहन करना चाहिये। उसके (जिह्वा के) अग्रभाग को लौहयंत्र (चिमटा) से धीरे-धीरे खींचकर (यह अभ्यास करना चाहिये)।
प्रयत्नपूर्वक सूर्योदय और सूर्यास्त के समय नित्यप्रति (यह धौति क्रिया) करनी चाहिये। और इस प्रकार नित्य किये जाने पर जिह्वा लम्बी हो जाती है।
कर्णधौति क्या है, बताते हैं-) तर्जनी तथा अनामिका दो अङ्गुलियों के योग से दोनों कानों के छिद्रों को नित्य ही मार्जन (स्वच्छ) करना चाहिये। इसके नियमित अभ्यास करने से एक विशिष्ट नाद प्रकट हुआ करता है।
(कपालरंध्र का शोधन कैसे करें, यह बताते हैं) प्रतिदिन निद्रा के अन्त में (अर्थात्‌ प्रातःकाल उठने के पश्चात), भोजन करने के बाद तथा दिनान्त (सोने से पूर्व) दाहिने हाथ के अंगुष्ठ से भालरंध्र (सिर में स्थित कपाल स्थान) को मार्जन (स्वच्छ) करना चाहिये।
इस अभ्यास को करने से कफ दोष निवारण होता है। नाड़ी निर्मलता को प्राप्त हो जाती है तथा दिव्य दृष्टि (स्वच्छदृष्टि) हो जाती है। (विशेष - यह क्रिया करने से निद्रा अच्छी आती है, वायुविकार कफ विकार शांत होता है)
(अब हद्धौति का वर्णन करते हैं-) हद्धौति को तीन प्रकार से करना चाहिये। ये तीन प्रकार हैं - दंड, वमन, और वास।
केला के दण्ड को, हल्दी के या वेत्रदण्ड को हृदय के मध्य में शनैशनै: चलाकर (प्रवेश करके) पुन: धीरे-धीरे बाहर निकालें।
(अब दण्डधौति का अर्थ करते हैं-) कफ, पित्त और क्लेद (घबराहट) को मुखमार्ग से (इस दण्डधौति क्रिया से) रेचन करते हैं (बाहर निकाल देते हें) यह हृदयरोग दण्डधौति के विधान से निश्चय नष्ट हो जाता है।
(वमन धौति क्या है? यह बताते हैं) भोजन के बाद में सुधीजन कंठ तक जल को पी लें, पुनः क्षणपर्यन्त उर्ध्वदृष्टरि करके उस जल का वमन कर दे।
इस प्रकार प्रतिदिन अभ्यासयोग से कफ और पित्त का निवारण करना चाहिये।
(वासधौति क्या है? इसे कहते हैं-) चार अङ्गुल के विस्तार वाला (चौड़ा) महीन (पतला) वस्त्र धीरे-धीरे निगलना चाहिये तथा पुन: इसे शनै:शनै: निकालना चाहिये। इस क्रिया को वासधोति कहते हें।
(वासधौति को करने से) गुल्म, ज्वर, प्लीहा, कुष्ठ, कफ और पित्त रोगों का विनाश होता है। तथा दिन-प्रतिदिन आरोग्य, बल एवं पुष्टि (की वृद्धि) होती है।
(मूलशोधन का लक्षण करते हैँ-) जब तक मूल शोधन नहीं होता (उदर शौच साफ नहीं होता) तब तक अपानवायु की क्रूरता रहती है अर्थात्‌ अपानवायु कष्टकारक बनी रहती है। अत: प्रयत्न पूर्वक मूल का शोधन करना चाहिये।
पीतमूल (हल्दी) के दण्ड से या मध्यम अङ्गुलि से यत्नपूर्वक जल से पुन:-पुनः गुह्यस्थान (मलद्वार) को धोना (साफ करना) चाहिये।
(इस शोधन क्रिया से) उदर की काठिन्यता का और अजीर्ण का निवारण करना चाहिये। यह कान्ति और पुष्टि की कारक तथा जठराग्नि की प्रदीप्त करने वाली है।
(अब बस्ति प्रकार बताते हैं-) जलबस्ति और शुष्कबस्ति, इस प्रकार बस्ति दो प्रकार की कही गयी है। जलबस्ति को जल में तथा शुष्कबस्ति को भूमि में करना चाहिये।
नाभिपर्यन्त जल में उत्कट आसन लगाये। तब मलदार का आकुञ्चन और प्रसारण (सिकोड़ना तथा फैलाना) करे, यह क्रिया जलबस्ति कही जाती है।
(इससे) प्रमेह, उदावर्त, और कुपित वायु का निवारण करना चाहिये। इससे देह स्वच्छन्द होता है तथा व्यक्ति कामदेव के समान रूपवान्‌ हो जाता हैं।
भूमि पर पश्चिमोत्तान होकर (पीठ को और ऊपर उठाकर) गुदाद्वार को चलाकर धीरे-धीरे अश्विनी मुद्रा से आकुञ्चन और प्रसारण (सिकोड़ना और फैलाना) की क्रिया करे।
(स्थलबस्ति के करने से) इस अभ्यासयोग से कोष्ठदोष नहीं होता है। जठराग्नि की वृद्धि होती है तथा आमवात का नाश होता है।
(अब नेतिविधि क्या है, यह बताते हैं-) वितस्तिमाप का सूक्ष्मधागा नासिका छिद्र में प्रवेश करना चाहिये। पुन: उसे मुख से निकालना चाहिये, यह नेति कर्म कहा जाता है।
नेतिकर्मो को साधने से खेचरी मुद्रा की सिद्धि प्राप्त होती है। इससे समस्त कफ दोष विनष्ट होते हैं तथा दिव्यदृष्टि उत्पन्न हो जाती है।
(लौलिकी विधि बताते हैं-) तीव्रवेग से उदर को दोनों पार्श्व भागों में घुमाये। यह सब प्रकार के रोगों को नष्ट करता है तथा जठराग्नि को बढ़ाता है।
(त्राटक विधि क्या है-) निमेषोन्मेष (पलक का खोलना-बन्द करना) छोड़कर एकटक से सूक्ष्म लक्ष्य को देखना चाहिये, जब तक कि अश्रु नहीं गिरते हैं। इसे विद्वानजन त्राटक कहते हैं।
इस (त्राटक विधि के) अभ्यासयोग से निश्चित ही शाम्भवी मुद्रा की सिद्धि हो जाती है। नेत्र के सब रोग विनष्ट होते हैं तथा दृष्टि दिव्य हो जाती है।
(अब कपालभाति क्या है, यह बताते हैं-) वातक्रम, व्युत्क्रम और शीतक्रम ये तीन भालभाति (कपालभाति) क्रियायें हैं। ये कफ दोष का निवारण करती है।
(वातक्रम कपालभाति क्या है, अब यह कहते हैं-) इडा से वायु को खीचे तथा पिङ्गला से पुन: रेचन करना चाहिये अर्थात्‌ वामनासिका छिद्र से श्वास लेकर दायें से निकालना चाहिये। तत्पश्चात्‌ पिङ्गला से श्वाँस लेकर इडा से रेचन करना चाहिये।
पूरक और रेचक का यह क्रम वेग से नहीं (अर्थात्‌ धीरे-धीरे) चलाना या करना चाहिये। इस प्रकार अभ्यास से कफदोष का निवारण होता है।
(व्युत्रमकपालभाति क्या है-) दोनों नासिका छिद्रों से जल को खींचकर पुन: मुख से उसे रेचन करना--निकालना चाहिये। पुनः व्युत्क्रम या उल्टे क्रम से मुख से पी-पी कर नाक से जल को गिराये। इस प्रकार श्लेष्मदोष का निवारण करना चाहिये।
(शीत्क्रम कपाल भाति का अर्थ करते हैं-) शीत्कार करते हुए मुख से जल पीकर पुन: नासिका छिद्रों से विरेचन करे। इस प्रकार के अभ्यास योग से व्यक्ति कामदेव के समान हो जाता है।
(इस अभ्यास योग से) वार्द्धक्य उत्पन्न नहीं होता है, न ही जरा या जीर्णता आती है। शरीर स्वच्छन्द या सुदूढ़ रहता है (इस प्रकार) कफदोष का निवारण करना चाहिये।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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