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घेरण्ड संहिता • अध्याय 1 • श्लोक 17
आकण्ठं पूरयेद्वारि वक्त्रेण पिबेच्छनैः । चालयेदुदरेणैव चोदराद्रेचयेदधः ॥
(पुन: वारिसार क्या है - यह बताते हैं) जल को धीरे-धीरे कण्ठ तक पीना चाहिये, पुन: उसे उदर में डुलायें या चलायें और पुन: उस पानी का रेचन अधोमार्ग से कर देना चाहिये या (शौच स्थान या मलद्वार से) निकाल देना चाहिये।
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