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घेरण्ड संहिता • अध्याय 1 • श्लोक 19
नाभिग्रन्थि मेरुपृष्ठे शतवारञ्च कारयेत्‌ । अग्निसारमेषा धौतिर्योगिनां योगसिद्धिदा ॥
(पुन: अग्निसार अतंर्धीति का अर्थ करते हैं-) नाभि ग्रन्थी (नाभिगाँठ) को सौ बार मेरुदण्ड (रीढ़) से लगाये (अर्थात्‌ पेट को अन्दर खींचना चाहिये । यह क्रिया योगिओं को सिद्धि देने वाली अग्निसार धौति कही जाती है।
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