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घेरण्ड संहिता • अध्याय 1 • श्लोक 28
दन्तमूलं परा धौतिर्योगीनां योगसाधने । नित्यं कुर्यात्प्रभाते च दन्तरक्षां च योगवित्‌ । दन्तमूलं धारणादिकार्येषु योगिनां मतम्‌ ॥
(यह) दन्तमूल धौति योगियों के योगसाधन में सर्वाधिक श्रेष्ठ है। योगवित्‌-योगज्ञानी जन को नित्यप्रति प्रभात समय में इसे करना चाहिये। योगियों के धारणीय कार्या (नियमों) में यह दन्तमूल (धौतिक्रिया मुख्य) मानी गयी है।
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