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घेरण्ड संहिता • अध्याय 1 • श्लोक 37
रम्भादण्डं हरिहण्डं वेत्रदण्डं तथैव च। हन्मध्ये चालयित्वा तु पुन: प्रत्याहरेच्छने: ॥
केला के दण्ड को, हल्दी के या वेत्रदण्ड को हृदय के मध्य में शनैशनै: चलाकर (प्रवेश करके) पुन: धीरे-धीरे बाहर निकालें।
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