(प्रक्षालन क्रिया का अर्थ करते हैं-) नाभिमग्न जल में स्थित होकर शक्ति नाड़ी का विसर्जन करना चाहिये । (अर्थात पेट को फुलाये रखना चाहिये तथा) दोनों हाथों से त्रिवलि स्थान को धोना चाहिये, जब तक कि मल का विसर्जन न हो जाये।
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