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घेरण्ड संहिता • अध्याय 1 • श्लोक 55
एवमभ्यासयोगेन शाम्भवी जायते ध्रुवम्‌ । नेत्ररोगा विनश्यन्ति दिव्यदृष्टिः प्रजायते ॥
इस (त्राटक विधि के) अभ्यासयोग से निश्चित ही शाम्भवी मुद्रा की सिद्धि हो जाती है। नेत्र के सब रोग विनष्ट होते हैं तथा दृष्टि दिव्य हो जाती है।
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