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घेरण्ड संहिता • अध्याय 1 • श्लोक 57
इडया पूरयेद्वायुं रेचयेत्पिङ्गलापुनः । पिङ्गलया पूरयित्वा पुनश्चन्द्रेण रेचयेत्‌ ॥
(वातक्रम कपालभाति क्या है, अब यह कहते हैं-) इडा से वायु को खीचे तथा पिङ्गला से पुन: रेचन करना चाहिये अर्थात्‌ वामनासिका छिद्र से श्वास लेकर दायें से निकालना चाहिये। तत्पश्चात्‌ पिङ्गला से श्वाँस लेकर इडा से रेचन करना चाहिये।
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