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घेरण्ड संहिता • अध्याय 1 • श्लोक 22
धारयेदर्द्धयामन्तु चालयेदर्धवर्त्मना । एषा धौतिः परागोप्या न प्रकाश्या कदाचन ॥
पुन: अर्धयाम (आधे प्रहर) पर्यन्त अर्थात्‌ डेढ़ घन्टे तक उसे उदर में धारण करे और अधोमार्ग (मलद्वार) से बाहर निकाले। यह धौति क्रिया भी (सार्वजनिक न होने से) गोपनीय ही है (अर्थात्‌ योगियों द्वारा की जानी ही संभव है)। (विशिष्ट समीक्षा - यहाँ प्राय: योगक्रियाओं को परं गोपनीया तथा देवों को भी दुर्लभ बताया है। इसका अभिप्राय यही है कि सामान्य जन न तो इन क्रियाओं को करते और न जानते ही हैं। जो बिरले योगीजन हें, मात्र वे ही इन्हें करते और जानते हैं (और इस प्रकार) वे ही मात्र देवदुर्लभ शरीर को प्राप्त करते हैं।)
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