खादिरेण रसेनाथ मृत्तिकया च शुद्धया ।
मार्जयेदन्तमूलञ्च यावत्किल्बिषमाहरेत् ॥
खदिर वृक्ष (खैर) के रस से और सूखी (शुद्ध) मिट्टी (पीली) से तब तक दन्तमूल का मार्जन करे, जब तक कि सब किल्बिष (मल) दूर न हो जाये।
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