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घेरण्ड संहिता • अध्याय 1 • श्लोक 41
चतुरङ्गुलविस्तारं सूक्ष्मवस्त्रं शनैर्ग्रसेत्‌ । पुनः प्रत्याहरेदेतत्प्रोच्यते धौतिकर्मक
(वासधौति क्या है? इसे कहते हैं-) चार अङ्गुल के विस्तार वाला (चौड़ा) महीन (पतला) वस्त्र धीरे-धीरे निगलना चाहिये तथा पुन: इसे शनै:शनै: निकालना चाहिये। इस क्रिया को वासधोति कहते हें।
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