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घेरण्ड संहिता • अध्याय 1 • श्लोक 33
तर्जन्यनामिकायोगान्मार्जयेत्‌ कर्णरन्ध्रयोः । नित्यमभ्यासयोगेन नादान्तरं प्रकाशयेत्‌ ।।
कर्णधौति क्या है, बताते हैं-) तर्जनी तथा अनामिका दो अङ्गुलियों के योग से दोनों कानों के छिद्रों को नित्य ही मार्जन (स्वच्छ) करना चाहिये। इसके नियमित अभ्यास करने से एक विशिष्ट नाद प्रकट हुआ करता है।
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