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घेरण्ड संहिता • अध्याय 1 • श्लोक 15
काकचञ्चूवदास्येन पिबेद्‌ वायुं शनैः शनैः । चालयेदुदरं पश्चाद्‌ वर्त्मना रेचयेच्छनैः ॥
(अब अंतर्धीति का वातसार प्रकार क्या है, यह बताते हैं-) (इसके लिये पहले) काकचंचु (कौवे की चौंच) के समान मुख से (मुख को बनाकर) वायु को शनै:-शनै: पीना चाहिये। पुन: उदर को चलाना चाहिये और मुख से वायु को शनै:-शनै: निकालना चाहिये।
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