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अध्याय 4 — चौथा अध्याय

विदुर नीति
74 श्लोक • केवल अनुवाद
विदुरजी कहते हैं - इस विषय में दरतात्रेय और साध्य देवताओं के संवाद रूप, इस प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं, यह मेरा भी सुना हुआ है।
प्राचीन काल की बात है, उत्तम वरत वाले महाबुद्धिमान् महर्षि दत्तात्रेय जी, साध्या देवा हंस (परमहंस) रूप से विचर रहे थे, उस समय साध्य देवताओं ने उनसे पूछा।
महर्षे! हम सब लोग साध्य देवता हैं, आपको केवल देख कर, हम आपके विषय में कुछ अनुमान नहीं कर सकते। हमें तो आप शास्त्र ज्ञान से बुक्त, धीर एव्ं बुद्धिमान् जान पड़ते हैं, अतः हम लोगों को विद्वत्तापूर्ण अपनी उदार बाणी सुनाने की कृपा करें।
हंस ने कहा - देवताओ! मैंने सुना है कि धैर्य धारण, मनोनिग्रह तथा सत्य-धर्मो का पालन ही कर्तव्य हैं, इसके द्वारा पुरुष को चाहिये कि हृदय की सारी गाँठ खोलकर, प्रिय और अप्रिय को अपनी आत्मा के समान समझे।
दूसरों से गाली सुनकर भी स्वयं उन्हें गाली न दे। क्षमा करने वाले का रोका हुआ क्रोध ही गाली देने वाले को जला डालता है, और उसके पुण्य को भी ले लेता है।
दूसरे को न तो गाली दे, और न उसका अपमान करे, मित्रों से द्रोह तथा नीच पुरुषों की सेवा न करे, सदाचार से हीन एवं अभिमानी न हो, रूखी तथा रोष भरी वाणी का परिल्याग करे।
इस जगत् में रूखी बातें मनुष्यों के मर्मस्थान, हड़ी, हुदय तथा प्राणीं को दग्ध करती रहती हैं, इसलिये धर्मानुरागी पुरुष जलाने वाली रूखी बातों को सदा के लिये परित्याग कर दे।
जिसकी वाणी रूखी और स्वभाव कठोर है, जो मर्म पर आघात करता है, और वाग्बाणों से मनुष्यों को पीड़ा पहुँचाता है, उसे ऐसा समझना चाहिये कि वह मनुष्यों में महा दरिद्र है, और वह अपने मुख में दरिद्रता, अथवा मौत को बाँधे हुए ढो रहा है।
यदि दूसरा कोई इस मनुष्य को, अग्नि और सूर्यक समान दग्ध करने वाले, तीखे याग्याणों से बहुत चोट पहुँचावे, तो वह विद्वान् पुरुष, चौट खाकर, अल्यन्त वेदना सहते हुए भी ऐसा समझे, कि वह मेरे पुण्यो को पुष्ट कर रहा है।
जैसे वस्त्र जिस रंग में रंगा जाय, वैसा ही हो जाता है, उसी प्रकार यदि कोई सज्जन, असजन, तपस्वी, अथवा चोर की सेवा करता है, तो वह उन्हीं के वश में हो जाता है, उस पर उन्ही का रंग चढ़ जाता है।
जो स्वयं किसी के प्रति बुरी बात नहीं कहता, दूसरों से भी नहीं कहलाता, विना मार खाये स्वयं न तो किसी को मारता है, और न दूसरों से ही मरवाता हैं, मार खाकर भी अपराधी को जा मारना नहीं चाहता, देवता भी उसके आगमन की बाट जोहते रहते हैं।
बोलने से न बौलना अच्छा बताया गया है, किंतु सत्य बोलना वाणी की दूसरी विशेषता है, यानी मौन की अपेक्षा भी दूना लाभप्रद है। सत्य भी यदि प्रिय बोला जाय, तो तीसरी विशेषता है, और वह भी यदि धर्म सम्मत कहा जाय, तो वह बचन की चौथी विशेषता है।
मनुष्य जैसे लोगो के साथ रहता है, जैसे लोगों की सेवा करता है, और जैसा होना चाहता है, वैसा ही हो जाता है।
मनुष्य जिन जिन विषयो से मन को हटाता जाता है, उन-उन से उसकी मुक्ति होती जाती है, इस प्रकार, यदि सब ओरस निवृत हो जाय, तो उसे लेश मात्र दुख का भी कभी अनुभव नहीं होता।
जो नं तो स्वयं किसी से जीता जाता है, ना दूसरो को जीतने की इच्छा करता है, न किसी के साथ वैर करता है, न दूसरो की चोट पहुचाना चाहता है, जो निन्दा और स्तुति में समान है, वह न शोक करता है और न हर्षित होता है।
जो सबका कल्याण चाहता है, किसी के अकल्याण की बात मन में भी नहीं लाता, जो सत्यवादी कोमल और जितेन्द्रिय है, वह उत्तम पुरुष माना गया है।
जो झुठी सान्त्वना नहीं देता, देने की प्रतिज्ञा कर के दे ही डालता है, दूसरों के दोषों को जानता है, वह मध्यम श्रेणी का पुरुष है।
जिसका शासन अतयंत कठोर हो, जो अनेक दोषों से दृषित हो, कलंकित हो, जो क्रोध वश किसी की बुराई करने से नहीं हटता हो, दूसरों के किये हुए उपकार को नहीं मानता हो, जिसकी किसी के साथ मित्रता नहीं हो, ये अधम पुरुष के भेद हैं।
जो अपने ही ऊपर संदह होने के कारण, दूसरों से भी कल्याण होने का विचार नहीं करता, मित्रो को भी दूर रखता है, अवश्य ही बह अधम पुरुष है।
जो अपनी उन्नति चाहता है, उत्तम पुरुषों की हो सवा करे, समय आ पड़ने पर मध्यम पुरुषों की भी सेवा कर ले, परंतु अधम पुरुषों की सेवा कदापि न करे।
मनुष्य दुष्ट पुरुषों के बल से, निरन्तर के उद्योग से, बुद्धि तथा पुरुषार्थ से, धन भले ही प्राप्त कर ले, परन्तु इस से उत्तम, कुलीन पुरुषों के सम्मान और सदाचार को बह पूर्ण रूप से कदापि नहीं प्राप्त कर सकता।
धृतराष्ट्र ने कहा - विदुर! धर्म और अर्थ के नित्य ज्ञाता, एवं बहुश्रुत देवता भी, उत्तम कुल में उत्पन्न पुरुषों की इच्छा करते हैं। इसलिये मैं तुमसे यह प्रश्न करता हूँ, कि महान् (उत्तम) कुल कौन है?
विदुर जी बोले - जिन में तप, इन्द्रिय संयम, वेदों का स्वाध्याय, यज्ञ, पवित्र विवाह, सदा अन्नदान, और सदाचार - ये सात गुण वर्तमान हैं, उन्हें महान् (उतम) कुल कहते हैं।
जिनका सदाचार शिथिल नहीं होता, जो अपने दोषों से माता-पिता को कष्ट नहीं पहुँचाते, प्रसन्न चित्त से धर्म का आाचरण करते हैं, तथा असत्य का परित्याग कर, अपने कुल की विशेष कीर्ति चाहते हैं, वे ही महान् कुलीन हैं।
यज्ञ न होने से, निन्दित कुल में विवाह करने से, वेद का त्याग, और धर्म का उलंघन करने से, उत्तम कुल भी अधम हो जाते हैं।
देवताओं के धन का नाश, ब्राह्मण के धन का अपहरण, और ब्राह्मणों की मर्यादा का उलंघन करने से, उत्तम कुल भी अधम हो जाते हैं।
भारत! ब्राह्माणो के अनादर और निन्दा से, तथा धरोहर रखी हुई वस्तु को छिपा लेने से, अच्छे कुल भी निन्दनीय हो जाते हैं।
गोओ, पुरुषों, और धन से सम्पन्न होकर भी, जो चरित्रहीन होते हैं, व अच्छे कुल की गणना मे नहीं आ सकते।
थोड़े धन वाले कुल भी यदि सदाचार से सम्पन्र हैं, तो वे अच्छे कुलों की गणना में आ जाते हैं, और महान् यश प्राप्त करते हैं ।
सदाचार की रक्षा यत्नपूर्वक करनी चाहिये, धन तो आता और जाता रहता है। धन क्षीण हो जाने पर भी, सदाचारी मनुष्य क्षीण नहीं माना जाता, किन्तु जो सदाचार से भ्रष्ट हो गया, उसे तो नष्ट ही समझना चाहिये।
जो कुल सदाचार से हीन हैं, वे गौओं, पशुओं, घोड़ों, तथा हरी-भरी खेती से सम्पन्न होने पर भी, उन्रति नहीं कर पाते।
हमारे कुल में कोई बैर करने वाला न हो, दूसरों के धन का अपहरण करने वाला राजा अथवा मन्त्री न हो, और मित्र द्रोही, कपटी तथा असल्यवादी न हो। इसी प्रकार माता-पिता, देवता एवं अतिथियों को भोजन कराने से यहले भोजन करने वाला भी न हो।
हम लोगों में से जो ब्राह्मणों की हत्या कर, बह्मण के साथ द्वेष कर, तथा पितृ को पि्डदान एवं त्पण न करे, वह हमारी सभा में शामिल नहीं होगा।
तृण का आसन, पृथ्वी, जल, और चौथी मीठी वाणी, सदाचारी के घर में, इन चार चीजों की कभी कमी नहीं होती।
महाप्राज्ञ राजन्! पुण्य कर्म करने वाले धर्मात्मा पुरुषों के यहाँ, ये तृण आदि वस्तुएँ बड़ी श्रद्धा के साथ सत्कार के लिये उपस्थित की जाती हैं।
नृपवर! छोटा-सा भी रथ भार ढो सकता है, किन्तु दूसरे काठ बड़े-बड़े होने पर भी ऐसा नहीं कर सकते। इसी प्रकार उत्तम कुल में उत्पन्न उत्साही पुरुष, भार सह सकते हैं, दूसरे मनुष्य वैसे नहीं होते।
जिसके कोप से भयभीत होना पड़े, तथा शङ्कित होकर जिसकी सेवा की जाय, वह मित्र नहीं है। मित्र तो वही है, जिस पर पिता की भाँति विश्वास किया जा सके, दूसरे तो सङ्गमात्र हैं।
पहले से कोई सम्बन्ध न होने पर भी, जो मित्रता का बर्ताव करे, वही बन्धु, वही मित्र, वही सहारा, और वही आश्रय हैं।
जिसका चित्त चंचल है, जो वृद्धों की सेवा नहीं करता, उस अनिश्चितमति पुरुष के लिये मित्रों का संग्रह स्थायी नहीं होता।
जैसे हंस सूखे सरोवर के आस-पास ही मंड़राकर रह जाते हैं, भीतर नहीं प्रवेश करते, उसी प्रकार जिसका चित्त चंचल है, जो अज्ञानी और इन्द्रियों का गुलाम है, उसे अर्थ की प्राप्ति नहीं होती।
दुष्ट पुरुषों का स्वभाव, मेध के समान चंचल होता है, वे सहसा क्रोध कर बैठते हैं, और अकारण ही प्रसन्न हो जाते हैं।
जो मित्रो से सत्कार पाकर, और उनकी सहायता में कृत काय होकर भी उनके नहीं होते, ऐसे कृतघों के मरने पर उनका मांस माँसभोजी जन्तु भी नहीं खाते।
धन हो या न हो, मित्रों का सत्कार करना चाहिए। वह नहीं जानता कि उसके मित्रों का सार महत्वहीन है।
शोक से मनुष्य अपना रूप खो देता है, और शोक से वह अपना बल खो देता है। दुख के कारण ज्ञान नष्ट हो जाता है, और दुख के कारण रोगी हो जाता है।
जो अप्राप्य है, उसके लिए शरीर दुख से तड़पता है, और शत्रु प्रसन्न होते हैं। इसलिये आप मन में शोक न करें।
मनुष्य बार-बार मरता और जन्म लेता है, बार- बार हानि उठाता और बड़ता है, बार-बार स्वयं दूसरे से याचना करता है, और दूसरे उससे यांचना करते हैं, तथा बारम्बार वह दूसरों के लिये शोक करता है, और टूसरे उसके लिये शोक करते हैं।
सुख-दुख, उत्पत्ति-विनाश, लाभ-हानि, और जीवन मरण, ये बारी - बारी से सबको प्राप्त होते रहते हैं, इसंलिये धीर पुरुष को इनके लिये हर्ष और शोक नहीं करना चाहिये।
ये छः इन्द्रियाँ बहुत ही चंचल हैं, इनमे से जो-जो इन्द्रि जिस-जिस विषय की ओर बढ़ती है, वहाँ-वृहाँ बुद्धि उसी प्रकार क्षीण होती है, जैसे फूटे घड़े से पानी सदा चू जाता है।
धृतराष्ट्र ने कहा - काठ में छिपी हुई आग के समान, सूक्ष्म धर्म से बँधे हुए राजा युधिष्ठिर के साथ मैंने मिथ्या व्यवहार किया है। अतः, वे मेरे मूर्ख पुत्रों का नाश कर डालेंगे।
महामते! यह सब कुछ सदा ही भय से उद्विम् है, मेरा यह मन भी भय से उद्विम्र है, इसलिये जो उद्वेगशून्य और शान्त पद हो, वही मुझे बताओ।
विदुर जी बोले - पापशून्य नरेश! विद्या, तप, इन्द्रियनिग्रह, और लोभ त्याग के सिवा, और कोई आपके लिये शान्ति का उपाय मैं नहीं देखता।
बुद्धि से मनुष्य अपने भव को दूर करता है, तपस्या से महत् पद को प्राप्त होता है, आध्यात्मिक गुरु की सेवा करने से, ज्ञान और शांति प्राप्त होती है।
मोक्ष की इच्छा रखने वाले मनुष्य, दान के पुण्य का आश्रय नहीं लेते, वेद के पुण्य का भी आश्रय नहीं लेते, किंतु निष्कामभाव से राग-द्वेष से रहित हो, इस विचरन्तीह लोक मे विचरते रहते हैं।
सम्यक् अध्ययन, न्यायोचित युद्ध, पुण्यकर्म, और अच्छी तरह की हुई तपस्या के अन्त में, सुख की वृद्धि होती है।
राजन! आपस में फूट रखने वाले लोग, अच्छे बिछौनों से युक्त पलंग पाकर भी कभी सुख की नींद नहीं सो पाते, उन्हें स्त्रियों के पास रहकर, तथा सूत-मागधों द्वारा की हुई स्तुति सुनकर भी प्रसन्नता नहीं होती।
जो परस्पर भेदभाव रखते हैं, वे कभी धर्म का आचरण नहीं करते। सुख की नहीं पाते। उन्हें गौरव नहीं प्राप्त होता, तथा शाक्ति की वार्ता भी नहीं सुहाती।
हित की बात भी कही जाय तो उन्हें अन्छी नहीं लगती, उनके योगक्षेम की भी सिद्धि नहीं हो पाती। राजन्! भटभाव वाले पुरुषों की, विनाश के सिवा और कोई गति नहीं है।
जैसे गोओं में दूध, बाह्मण में तप, और स्त्रियों में चन्चल्ता का होना अधिक सम्भव है, उसी प्रकार, अपने जाति-बन्धुओं से भय होना भी सम्भव ही है।
नित्य सींचकर बढ़ायी हुई पतली लताएँ, बहुत होने के कारण, बहुत वर्षों तक नाना प्रकार के झाके सहती है, यही बात सत्पुरुषों कि विषय में भी समझनी चाहिये। (वे दुर्बल होने पर भी सामूहिक शक्ति से बलवान् होते जाते हैं)।
भरतश्रेष्ठ धृतराष्ट्र! जलती हुई लकड़ियाँ अलग-अलग होने पर धुआँ फेंकती हैं, और एक साथ होने पर प्रज्वलित हो उठती हैं। इसी प्रकार जाती बन्दुओं में भी फूट होने पर दुखी, और एकता होने पर सुखी रहते हैं।
जो लोग ब्राह्मण, स्त्रियों, जाति वालों, और गोओ पर ही शूरता प्रकट करते हैं, हे धृतराष्ट्र, वे वृक्ष से पके फल की तरह नीचे गिर जाते हैं।
यदि वृक्ष अकला है तो वह बलवान्, दृढ़मूल, तथा बहुत बड़ा होने पर भी, एक ही क्षण ने आँधी के द्वारा बल पूर्वक, शाखाओ सहित धराशाइ किया जा सकता है।
किन्तु जो बहुत से बृक्ष, एक साथ रह कर समूह के रूप में जुड़े हैं, वे एक-टूसरे के सहारे बड़ी से बड़ी आँधी को भी सह सकते है।
समस्त गुणो से सम्पन्न होने पर भी, अकेले होने के कारण, शत्रु अपनी शक्ति के अन्दर समझते हैं। जिस तरह हवा एक पेड़ को उड़ा देती है, उसी तरह जो लोग इससे नफरत करते हैं, वे सोचते हैं कि यह संभव है।
किन्तु परस्पर मेल होने से, और एक से दूसरे को सहारा मिलने से, जाति वाले लोग इस प्रकार वृद्धि को प्राप्त होते हैं, जैसे तालाब में कमल।
ब्राह्मण, गौ, कुटम्बी, बालक, स्त्री, अन्नदाता, और शरणागत-ये अवध्य होते हैं।
राजन्! आपका कल्याण हो, मनुष्य में धन, और आरोग्य को छोड़कर, दूसरा कोई गुण नहीं है, क्योंकि रोगी तो मुर्दे के समान है।
महाराज! जो बिना रोग के उत्पन्न, कड़वा, सिर में दर्द पैदा करने वाला, पाप से सम्बद्ध, कठोर, तीखा और गरम है, जो सज्जनों द्वारा पान करने योग्य है, और जिसे दुर्जन नहीं पी सकते, उस क्रोध को आप पी जाइये और शान्त होइये।
रोग से पीड़ित मनुष्य, मधुर फल का आदर नहीं करते, विषयों में भी कुछ सुख या सार नहीं मिलता। रोगी सदा ही दुखी रहते हैं, वे न धन सम्बन्धी भोगों का, और न सुख का ही अनुभव करते हैं।
राजन्! पहले जुए में द्रौपदी को जीती गयी देखकर, मैंने आपसे का था, आप छूत क्रीडा में आसक्त दर्योधन को रोकिये। विद्वान लोग इस के लिये मना करते हैं, कितु आपने मैरा कहना नहीं माना।
यह बल नहीं, जिसका मुदल स्वभाव के साथ विरोध हो, बल्कि धर्म का मिश्रण है, जिसे शीघ्रता से परोसा जाना है। कृरतापूर्वक उपाज्जन को हुई लक्ष्मी नश्चर हो है, यदि बह मृदुलतापूर्वक बढ़ायी गयी हो, तो पुत्र-पौत्रो तक रहती है।
राजन्! आपके पुत्र पाण्डवों की रक्षा करें ,और पाण्डु के पुत्र आपके पुत्रों की रक्षा करें, सभी कौरव एक-दूसरे के शत्रु को शत्रु, और मित्र को मित्र समझे। सबका एक ही कर्तव्य हो, सभी सुखी, और समृद्धिशाली होकर जीवन व्यतीत करें।
अज़मीढकुलनन्दन! इस समय आप ही कौरवों के आधार स्तम्भ हैं, कुरुवंश आपके ही अधीन है। तात! कुन्ती के पुत्र अभी बालक हैं, और वनवास से बहुत कष्ट पा चुके हैं, इस समय अपने यश की रक्षा करते हुए पाण्डवों का पालन कीजिये।
कुरुराज! आप पाण्डवो से सन्धि कर ले, जिससे शत्रुओं को आपका छिद्र देखने का अवसर न मिल सके। नरदेव, समस्त पाण्डव सल्य पर डुटे हुए है, अब आप अपने पुत्र दुर्याधन को राकिये।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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