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विदुर नीति • अध्याय 4 • श्लोक 32
मा नः कुले वैरकृत्कश् चिदस्तु राजामात्यो मा परस्वापहारी । मित्रद्रोही नैकृतिकोऽनृती वा पूर्वाशी वा पितृदेवातिथिभ्यः ॥
हमारे कुल में कोई बैर करने वाला न हो, दूसरों के धन का अपहरण करने वाला राजा अथवा मन्त्री न हो, और मित्र द्रोही, कपटी तथा असल्यवादी न हो। इसी प्रकार माता-पिता, देवता एवं अतिथियों को भोजन कराने से यहले भोजन करने वाला भी न हो।
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