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विदुर नीति • अध्याय 4 • श्लोक 5
आक्रुश्यमानो नाक्रोशेन्मन्युरेव तितिक्षितः । आक्रोष्टारं निर्दहति सुकृतं चास्य विन्दति ॥
दूसरों से गाली सुनकर भी स्वयं उन्हें गाली न दे। क्षमा करने वाले का रोका हुआ क्रोध ही गाली देने वाले को जला डालता है, और उसके पुण्य को भी ले लेता है।
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