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विदुर नीति • अध्याय 4 • श्लोक 2
चरन्तं हंसरूपेण महर्षिं संशितव्रतम् । साध्या देवा महाप्राज्ञं पर्यपृच्छन्त वै पुरा ॥
प्राचीन काल की बात है, उत्तम वरत वाले महाबुद्धिमान् महर्षि दत्तात्रेय जी, साध्या देवा हंस (परमहंस) रूप से विचर रहे थे, उस समय साध्य देवताओं ने उनसे पूछा।
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