जिसके कोप से भयभीत होना पड़े, तथा शङ्कित होकर जिसकी सेवा की जाय, वह मित्र नहीं है। मित्र तो वही है, जिस पर पिता की भाँति विश्वास किया जा सके, दूसरे तो सङ्गमात्र हैं।
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