न जीयते नोत जिगीषतेऽन्यान् न वैरक्कृच्चाप्रतिघातकश् च ।
निन्दा प्रशंसासु समस्वभावो न शोचते हृष्यति नैव चायम् ॥
जो नं तो स्वयं किसी से जीता जाता है, ना दूसरो को जीतने की इच्छा करता है, न किसी के साथ वैर करता है, न दूसरो की चोट पहुचाना चाहता है, जो निन्दा और स्तुति में समान है, वह न शोक करता है और न हर्षित होता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
विदुर नीति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
विदुर नीति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।