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विदुर नीति • अध्याय 4 • श्लोक 11
वादं तु यो न प्रवदेन्न वादयेद् यो नाहतः प्रतिहन्यान्न घातयेत् । यो हन्तुकामस्य न पापमिच्छेत् तस्मै देवाः स्पृहयन्त्यागताय ॥
जो स्वयं किसी के प्रति बुरी बात नहीं कहता, दूसरों से भी नहीं कहलाता, विना मार खाये स्वयं न तो किसी को मारता है, और न दूसरों से ही मरवाता हैं, मार खाकर भी अपराधी को जा मारना नहीं चाहता, देवता भी उसके आगमन की बाट जोहते रहते हैं।
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