प्राप्नोति वै वित्तमसद्बलेन नित्योत्थानात्प्रज्ञया पौरुषेण ।
न त्वेव सम्यग्लभते प्रशंसां न वृत्तमाप्नोति महाकुलानाम् ॥
मनुष्य दुष्ट पुरुषों के बल से, निरन्तर के उद्योग से, बुद्धि तथा पुरुषार्थ से, धन भले ही प्राप्त कर ले, परन्तु इस से उत्तम, कुलीन पुरुषों के सम्मान और सदाचार को बह पूर्ण रूप से कदापि नहीं प्राप्त कर सकता।
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