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विदुर नीति • अध्याय 4 • श्लोक 9
परश्चेदेनमधिविध्येत बाणैर् भृशं सुतीक्ष्णैरनलार्क दीप्तैः । विरिच्यमानोऽप्यतिरिच्यमानो विद्यात्कविः सुकृतं मे दधाति ॥
यदि दूसरा कोई इस मनुष्य को, अग्नि और सूर्यक समान दग्ध करने वाले, तीखे याग्याणों से बहुत चोट पहुँचावे, तो वह विद्वान् पुरुष, चौट खाकर, अल्यन्त वेदना सहते हुए भी ऐसा समझे, कि वह मेरे पुण्यो को पुष्ट कर रहा है।
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