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विदुर नीति • अध्याय 4 • श्लोक 50
नित्योद्विग्नमिदं सर्वं नित्योद्विग्नमिदं मनः । यत्तत्पदमनुद्विग्नं तन्मे वद महामते ॥
महामते! यह सब कुछ सदा ही भय से उद्विम् है, मेरा यह मन भी भय से उद्विम्र है, इसलिये जो उद्वेगशून्य और शान्त पद हो, वही मुझे बताओ।
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