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विदुर नीति • अध्याय 4 • श्लोक 60
धूमायन्ते व्यपेतानि ज्वलन्ति सहितानि च । धृतराष्ट्रोल्मुकानीव ज्ञातयो भरतर्षभ ॥
भरतश्रेष्ठ धृतराष्ट्र! जलती हुई लकड़ियाँ अलग-अलग होने पर धुआँ फेंकती हैं, और एक साथ होने पर प्रज्वलित हो उठती हैं। इसी प्रकार जाती बन्दुओं में भी फूट होने पर दुखी, और एकता होने पर सुखी रहते हैं।
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