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विदुर नीति • अध्याय 4 • श्लोक 57
न वै तेषां स्वदते पथ्यमुक्तं योगक्षेमं कल्पते नोत तेषाम् । भिन्नानां वै मनुजेन्द्र परायणं न विद्यते किं चिदन्यद्विनाशात् ॥
हित की बात भी कही जाय तो उन्हें अन्छी नहीं लगती, उनके योगक्षेम की भी सिद्धि नहीं हो पाती। राजन्! भटभाव वाले पुरुषों की, विनाश के सिवा और कोई गति नहीं है।
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