ये छः इन्द्रियाँ बहुत ही चंचल हैं, इनमे से जो-जो इन्द्रि जिस-जिस विषय की ओर बढ़ती है, वहाँ-वृहाँ बुद्धि उसी प्रकार क्षीण होती है, जैसे फूटे घड़े से पानी सदा चू जाता है।
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