न वै भिन्ना जातु चरन्ति धर्मं न वै सुखं प्राप्नुवन्तीह भिन्नाः ।
न वै भिन्ना गौरवं मानयन्ति न वै भिन्नाः प्रशमं रोचयन्ति ॥
जो परस्पर भेदभाव रखते हैं, वे कभी धर्म का आचरण नहीं करते। सुख की नहीं पाते। उन्हें गौरव नहीं प्राप्त होता, तथा शाक्ति की वार्ता भी नहीं सुहाती।
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