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विदुर नीति • अध्याय 4 • श्लोक 59
तन्तवोऽप्यायता नित्यं तन्तवो बहुलाः समाः । बहून्बहुत्वादायासान्सहन्तीत्युपमा सताम् ॥
नित्य सींचकर बढ़ायी हुई पतली लताएँ, बहुत होने के कारण, बहुत वर्षों तक नाना प्रकार के झाके सहती है, यही बात सत्पुरुषों कि विषय में भी समझनी चाहिये। (वे दुर्बल होने पर भी सामूहिक शक्ति से बलवान् होते जाते हैं)।
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