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विदुर नीति • अध्याय 4 • श्लोक 3
साध्या ऊचुः । साध्या देवा वय्मस्मो महर्षे दृष्ट्वा भवन्तं न शक्नुमोऽनुमातुम् । श्रुतेन धीरो बुद्धिमांस्त्वं मतो नः काव्यां वाचं वक्तुमर्हस्युदाराम् ॥
महर्षे! हम सब लोग साध्य देवता हैं, आपको केवल देख कर, हम आपके विषय में कुछ अनुमान नहीं कर सकते। हमें तो आप शास्त्र ज्ञान से बुक्त, धीर एव्ं बुद्धिमान् जान पड़ते हैं, अतः हम लोगों को विद्वत्तापूर्ण अपनी उदार बाणी सुनाने की कृपा करें।
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