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विदुर नीति • अध्याय 4 • श्लोक 53
अनाश्रिता दानपुण्यं वेद पुण्यमनाश्रिताः । रागद्वेषविनिर्मुक्ता विचरन्तीह मोक्षिणः ॥
मोक्ष की इच्छा रखने वाले मनुष्य, दान के पुण्य का आश्रय नहीं लेते, वेद के पुण्य का भी आश्रय नहीं लेते, किंतु निष्कामभाव से राग-द्वेष से रहित हो, इस विचरन्तीह लोक मे विचरते रहते हैं।
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