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विदुर नीति • अध्याय 4 • श्लोक 6
नाक्रोशी स्यान्नावमानी परस्य मित्रद्रोही नोत नीचोपसेवी । न चातिमानी न च हीनवृत्तो रूक्षां वाचं रुशतीं वर्जयीत ॥
दूसरे को न तो गाली दे, और न उसका अपमान करे, मित्रों से द्रोह तथा नीच पुरुषों की सेवा न करे, सदाचार से हीन एवं अभिमानी न हो, रूखी तथा रोष भरी वाणी का परिल्याग करे।
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