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विदुर नीति • अध्याय 4 • श्लोक 71
न तद्बलं यन्मृदुना विरुध्यते मिश्रो धर्मस्तरसा सेवितव्यः । प्रध्वंसिनी क्रूरसमाहिता श्रीर् मृदुप्रौढा गच्छति पुत्रपौत्रान् ॥
यह बल नहीं, जिसका मुदल स्वभाव के साथ विरोध हो, बल्कि धर्म का मिश्रण है, जिसे शीघ्रता से परोसा जाना है। कृरतापूर्वक उपाज्जन को हुई लक्ष्मी नश्चर हो है, यदि बह मृदुलतापूर्वक बढ़ायी गयी हो, तो पुत्र-पौत्रो तक रहती है।
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