यह बल नहीं, जिसका मुदल स्वभाव के साथ विरोध हो, बल्कि धर्म का मिश्रण है, जिसे शीघ्रता से परोसा जाना है। कृरतापूर्वक उपाज्जन को हुई लक्ष्मी नश्चर हो है, यदि बह मृदुलतापूर्वक बढ़ायी गयी हो, तो पुत्र-पौत्रो तक रहती है।
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