यदि सन्तं सेवते यद्यसन्तं तपस्विनं यदि वा स्तेनमेव ।
वासो यथा रङ्ग वशं प्रयाति तथा स तेषां वशमभ्युपैति ॥
जैसे वस्त्र जिस रंग में रंगा जाय, वैसा ही हो जाता है, उसी प्रकार यदि कोई सज्जन, असजन, तपस्वी, अथवा चोर की सेवा करता है, तो वह उन्हीं के वश में हो जाता है, उस पर उन्ही का रंग चढ़ जाता है।
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