सुखं च दुःखं च भवाभवौ च लाभालाभौ मरणं जीवितं च ।
पर्यायशः सर्वमिह स्पृशन्ति तस्माद्धीरो नैव हृष्येन्न शोचेत् ॥
सुख-दुख, उत्पत्ति-विनाश, लाभ-हानि, और जीवन मरण, ये बारी - बारी से सबको प्राप्त होते रहते हैं, इसंलिये धीर पुरुष को इनके लिये हर्ष और शोक नहीं करना चाहिये।
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