येषां न वृत्तं व्यथते न योनिर् वृत्तप्रसादेन चरन्ति धर्मम् ।
ये कीर्तिमिच्छन्ति कुले विशिष्टां त्यक्तानृतास्तानि महाकुलानि ॥
जिनका सदाचार शिथिल नहीं होता, जो अपने दोषों से माता-पिता को कष्ट नहीं पहुँचाते, प्रसन्न चित्त से धर्म का आाचरण करते हैं, तथा असत्य का परित्याग कर, अपने कुल की विशेष कीर्ति चाहते हैं, वे ही महान् कुलीन हैं।
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