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विदुर नीति • अध्याय 4 • श्लोक 12
अव्याहृतं व्याहृताच्छ्रेय आहुः सत्यं वदेद्व्याहृतं तद्द्वितीयम् । प्रियंवदेद्व्याहृतं तत्तृतीयं धर्म्यं वदेद्व्याहृतं तच्चतुर्थम् ॥
बोलने से न बौलना अच्छा बताया गया है, किंतु सत्य बोलना वाणी की दूसरी विशेषता है, यानी मौन की अपेक्षा भी दूना लाभप्रद है। सत्य भी यदि प्रिय बोला जाय, तो तीसरी विशेषता है, और वह भी यदि धर्म सम्मत कहा जाय, तो वह बचन की चौथी विशेषता है।
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