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अध्याय 2 — दूसरा अध्याय
विदुर नीति
86 श्लोक • केवल अनुवाद
धृतराष्ट्र बोले - तात! मैं चिन्ता से जलता हुआ अभी तक जाग रहा हूँ, तुम मेरे करने योग्य जो कार्य समझो, उसे बताओ; क्योंकि हम लोगों में तुम्हीं धर्म और अर्थ के ज्ञान में निपुण हो।
उदारचित्त विदुर! तुम अपनी बुद्धि से विचारकर, मुझे ठीक-ठीक उपदेश करो। जो बात युधिष्ठिर के लिये हितकर, और कौरवों के लिये कल्याणकारी समझो, वह सब अवश्य बताओ।
विद्वन्! मेरे मन में अनिष्ट की आशङ्का बनी रहती है, इसलिये में सर्वत्र अनिष्ट ही देखता हूँ, अतः व्याकुल हृदय से में तुमसे पूछ रहा हूँ, अजात शत्रु युधिष्ठिर क्या चाहते हैं? सो सब ठीक-ठीक बताओ।
विदुरजी ने कहा - मनुष्यों को चाहिये, कि वह जिसकी पराजय नहीं चाहता, उसको बिना पूछे भी कल्याण करने वाली, या अनिष्ट करने वाली अच्छी अथवा बुरी - जो भी बात हो, बता दे।
इसलिये राजन्! जिससे समस्त कौरवों का हित हो, वही बात आपसे कहुँगा। मैं जो कल्याणकारी एवं धर्मयुक्त वचन कह रहा हूँ, उन्हें आप ध्यान देकर सुनें।
असत् उपायों (जूआ आदि) का प्रयोग करके, जो कपट पूर्ण कार्य सिद्ध होते हैं, उनमें आप मन मत लगाइये।
इसी प्रकार अच्छे उपायों का उपयोग करके, सावधानी के साथ किया गया कोई कर्म, यदि सफल न हो, तो बुद्धिमान् पुरुष को उसके लिये मन में ग्लानि नहीं करनी चाहिये।
किसी प्रयोजन से किये गये कर्मों में, पहले प्रयोजन को समझ लेना चाहिये। खूब सोच-विचारकर काम करना चाहिये, जल्दबाजी से किसी काम का आरम्भ नहीं करना चाहिये।
धीर मनुष्य को उचित है, कि पहले कर्मों के प्रयोजन, परिणाम, तथा अपनी उन्नति का विचार करके, फिर काम आरम्भ करे या न करे।
जो राजा स्थिति, लाभ, हानि, खजाना, देश तथा दण्ड आदि की मात्रा को नहीं जानता, वह राज्य पर स्थित नहीं रह सकता।
जो इनके प्रमाणों को ठीक-ठीक जानता है, तथा धर्म और अर्थ के ज्ञान में दत्तचित्त रहता है, वह राज्य को प्राप्त करता है।
अब तो राज्य प्राप्त हो ही गया, ऐसा समझकर अनुचित बर्ताव नहीं करना चाहिये। उद्दष्डता सम्पत्ति को उसी प्रकार नष्ट कर देती है, जैसे सुन्दर रूप को बुढ़ापा।
मछली बढ़िया चारे से ढकी हुई, लोहे की काँटी को लोभ में पड़कर निगल जाती है, उस से होने वाले परिणाम पर विचार नहीं करती।
अतः अपनी उन्नति चाहने वाले पुरुष को वही वस्तु खानी (या ग्रहण करनी) चाहिये, जो खाने योग्य हो, तथा खायी जा सके, खाने (या ग्रहण करने) पर पच सके, और पच जाने पर हितकारी हो।
जो पेड़ से कच्चे फलों को तोड़ता है, वह उन फलो से रस तो पाता नहीं; उलटे उस वृक्ष के बीज का नाश होता है।
परन्तु जो समय पर पके हुए फल को ग्रहण करता है, वह फल से रस पाता है, और उस बीज से पुनः फल प्राप्त करता है।
जैसे भौरा फूलों की रक्षा करता हुआ ही, उनके मधु का आस्वादन करता है, उसी प्रकार राजा भी प्रजाजनों को कष्ट दिये बिना ही, उनसे धन ले।
जैसे माली बगीचे में एक-एक फूल तोड़ता है, उसकी जड़ नहीं काटता, उसी प्रकार राजा प्रजा की रक्षा - पूर्वक उनसे कर ले। कोयला बनाने वाले की तरह जड़ नहीं काटनी चाहिये।
इसे करने से मेरा क्या लाभ होगा, और न करने से क्या हानि होगी - इस प्रकार कर्म के विषय में, भली-भाँति विचार करके फिर मनुष्य करे या न करे।
कुछ ऐसे व्यर्थ कार्य हैं, जो निल्य आप्राप्त होने के कारण, आरम्भ करने योग्य नहीं होते, क्योंकि उनके लिये किया हृुआ पुरुषार्थ भी व्यर्थ हो जाता है।
जिसकी प्रसन्नता का कोई फल नहीं, और क्रोध भी व्यर्थ है, उसको प्रजा स्वामी बनाना नहीं चाहती - जैसे स्त्री नपुंसक को पति नहीं बनाना चाहती।
जिनका मूल (साधन) छोटा, और फल महान् हो, बुद्धिमान् पुरुष उनको शीघ्र ही आरम्म कर देता है, वैसे कामों में वह विघ्न नहीं आने देता।
जो राजा मानो आँखों से पी जायगा, इस प्रकार प्रेम के साथ कोमल दृष्टि से देखता है, वह चुपचाप बैठा रहे, तो भी प्रजा उससे अनुराग रखती है।
राजा वृक्ष की भाँति अच्छी तरह फूलने ( प्रसन्न रहने) पर भी फल से खाली रहे, (यानि अधिक देने वाला न हों), यदि फल से युक्त, (देने वाला) हो, तो भी जिस पर चढ़ा न जा सके, ऐसा (यानि पहुँच के बाहर) होकर रहे । कच्चा (यानि कम शक्ति वाला) होने पर भी पके (यानि शक्ति सम्पन्न) की भाँति, अपने को प्रकट करे, ऐसा करने से वह नष्ट नहीं होता।
जो राजा नेत्र, मन, वाणी, और कर्म - इन चारों से प्रजा को प्रसन्न करता है, उसी से प्रजा प्रसन्न रहती है।
जैसे व्याघ्र से हिरण भयभीत होता है, उसी प्रकार जिससे समस्त प्राणी डरते हैं, वह समुद्र पर्यन्त, पृथ्वी का राज्य पाकर भी, प्रजाजनों के द्वारा त्याग दिया जाता है।
अन्याय में स्थित हुआ राजा, बाप-दादों का राज्य पाकर भी, अपने ही कर्मो से उसे इस तरह भ्रष्ट कर देता है, जैसे हवा बादल को छिन्न-भिन्न कर देती है।
परम्परा से, सज्जन पुरुषों द्वारा किये हुए धर्म का आचरण करने वाले राजा के राज्य की पृथ्वी, धन-धान्य से पूर्ण होकर, उन्नति को प्राप्त होती है, और उसके ऐश्वर्य को बढ़ाती है।
जो राजा धर्म को छोड़ता, और अधर्म का अनुष्ठान करता है, उसकी राज्यभूमि आग पर रखे हुए चमड़े की भाँति संकुचित हो जाती है।
जो यत्न, दूसरे राष्ट्रों का नाश करने के लिये किया जाता है, वही अपने राज्य की रक्षा के लिये करना उचित है।
धर्म से ही राज्य प्राप्त करे, और धर्म से ही उसकी रक्षा करे, क्योंकि धर्म मूलक राज्य, लक्ष्मी को पाकर, न तो राजा उसे छोड़ता है, और न वहीं राजा को छोड़ती है।
निरर्थक बोलने वाले, पागल तथा बकवाद करनेवाले बच्चे से भी, सब ओर से उसी भाँति तत्व की बात ग्रहण करनी चाहिये, जैसे पत्थरों में से सोना ले लिया जाता है।
जैसे उष्छवति से जीविका चलाने वाला एक-एक दानों चुगता रहता है, उसी प्रकार, धोर पुरुष को सत्कर्मो का संग्रह करते रहना चाहिये।
गोएँ गन्ध से, ब्राह्मण लोग वेदों से, राजा जासूसों से, और अन्य साधारण लोग आँखों से देखा करते हैं।
राजन! जो गाय बड़ी कठिनाई से दुने देती हैं, वह बहुत हेश उठाती हैं, किंतु जो आसानी से दुध देती है, उसे लोग कष्ट नहीं देते।
जो धातु बिना गरम किये मुड़ जाते हैं, उन्हें आग में नहीं तपाते। जो काठ स्वयं झुका होता है, उसे लोग झुकाने का प्रयल्न नहीं करते।
इस दृष्टान्त के अनुसार, बुद्धिमान् पुरुष को अधिक बलवान के सामने झुक जाना चाहिये, जो अधिक बलवान के सामने झुकता है, वह मानो इन्द्र देवता को प्रणाम करता है।
पशुओं के रक्षक या स्वामी हैं बादल, राजाओं के सहायक हैं मन्त्री, ख्तरियों के बन्धु (रक्षक) हैं पति, और ब्राह्मणों के बान्धव हैं वेद।
सत्य से धर्म की रक्षा होती है, योग से विद्या सुरक्षित होती है, सफाई से रूप की रक्षा होती है, और सदाचार से कुल की रक्षा होती है।
तौलने से नाज की रक्षा होती है, फेरने से घोड़े सुरक्षित रहते हैं, बारम्बार देखभाल करने से गौओं की, तथा मैले वस्त्र से स्त्रियों की रक्षा होती है।
मेरा ऐसा विचार है, कि सदाचार से हीन मनुष्य का केवल ऊँचा कुल मान्य नहीं हो सकता, क्योंकि नीच कुल में उत्पन्न मनुष्यों का भी सदाचार श्रेष्ठ माना जाता है।
जो दूसरों के धन, रूप, पराक्रम, कुलीनता, सुख, सौभाग्य, और सम्मान पर डाह करता है, उसका यह रोग असाध्य हैं।
न करने योग्य काम करने से, करने योग्य काम में प्रमाद करने से, तथा कार्य सिद्ध होने के पहले ही मन्त्र प्रकट हो जाने से डरना चाहिये, और जिससे नशा चढ़े, ऐसा पेय नहीं पीना चाहिये।
विद्या का मद, धन का मद, और तीसरा ऊँचे कुल का मद है। ये घमण्डी पुरुषों के लिये तो मद हैं, परंतु सज्जन पुरुषों के लिये दमके साधन हैं।
कभी किसी कार्य में, सज्जनों द्वारा प्रार्थित होने पर, दुष्ट लोग अपने को प्रसिद्ध दुष्ट जानते हुए भी, सज्जन मानने लगते हैं।
मनस्वी पुरुषों को सहारा देने वाले सन्त हैं, सन्तों के भी सहारे सन्त ही हैं, दुष्टों को भी सहारा देने वाले सन्त हैं, पर दुष्टलोग सन्तों को सहारा नहीं देते।
अच्छे वस्त्र वाला सभा को जीतता, (यानि अपना प्रभाव जमा लेता) है, जिसके पास गौ है, वह मीठे स्वाद की आकाङ्क्षा को जीत लेता है; सबारी से चलने वाला मार्ग को जीत लेता (यानि तय कर लेता) है, और शीलवान् पुरुष सब पर विजय पा लेता है।
पुरुष में शील ही प्रधान है, जिसका बही नष्ट हो जाता है, इस संसार में उसका जीवन, धन, और बन्धुओं से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।
भरतश्रेष्ठ! धनोन्मत्त पुरुषों के भोजन में माँस की, मध्यम श्रेणी वालों के भोजन में गोरस की, तथा दरिद्रों के भोजन में तेल की प्रधानता होती है।
दरिद्र पुरुष सदा स्वादिष्ट ही भोजन करते हैं, क्योंकि भूख उनके भोजन में स्वाद उत्पन्न कर देती है, और वह ( भूख) धनियों के लिये सर्वथा दुर्लभ है।
राजन्! संसार में धनियों को प्रायः भोजन करने की शक्ति नहीं होती, किन्तु दरिद्रों के पेट में काठ भी पच जाते हैं।
अधम पुरुषों को जीविका न होने से भय लगता है, मध्यम श्रेणी के मनुष्यों को मृत्यु से भय होता है, परंतु उत्तम पुरुषों को अपमान से ही महान् भय होता है।
यों तो पीने का नशा आदि भी नशा ही है, किंतु ऐश्वर्य का नशा तो बहुत ही बुरा है, क्योंकि ऐश्वर्य के मद से मतवाला पुरुष, श्रष्ट हुए बिना होश में नहीं आता।
वशमें न होनेके कारण, विषयों में रमने वाली इन्द्रियों से, यह संसार उसी भाँति कष्ट पाता है, जैसे सूर्य आदि ग्रहों से नक्षत्र तिरस्कृत हो जाते हैं।
जो मनुष्य, जीवों को वश में करने वाली, सहज पाँच इन्द्रियों से जीत लिया गया, उसकी आपत्तियाँ शुक्लपक्ष के चन्द्रमा की भाँति बढ़ती हैं।
इन्द्रियों सहित, मन को जीते बिना ही जो मन्त्रियों को जीतने की इच्छा करता है, या मन्त्रियों को अपने अधीन किये बिना, शत्रुको जीतना चाहता है, उस अजितेन्द्रिय पुरुष को सब लोग त्याग देते हैं।
जो पहले इन्द्रियों सहित मन को ही शत्रु समझकर जीत लेता है, उसके बाद, यदि वह मन्त्रियों तथा शत्रुओं को जीतने की इच्छा करे, तो उसे सफलता मिलती है।
इन्द्रियों तथा मन को जीतने वाले, अपराधियों को दण्ड देने वाले, और जाँच-परखकर काम करने वाले, धीर पुरुष की लक्ष्मी अत्यन्त सेवा करती हैं।
राजन्! मनुष्य का शरीर रथ है, बुद्धि सारथि है, और इन्द्रियाँ इसके घोड़े हैं। इनको वश में करके सावधान रहने वाला चतुर एवं धीर पुरुष, काबू में किये हुए घोड़ों से रथी की भाँति, सुखपूर्वक यात्रा करता है।
शिक्षा न पाये हुए, तथा काबू में न आने वाले घोड़े, जैसे मूर्ख सारथि को मार्ग में मार गिराते हैं, वैसे ही ये इन्द्रियाँ वश में न रहने पर, पुरुष को मार डालने में भी समर्थ होती हैं।
इन्द्रियाँ बश में न होने के कारण, अर्थ को अनर्थ, और अनर्थ को अर्थ समझकर, अज्ञानी पुरुष बहुत बड़े दुख को भी सुख मान बैठता है।
जो धर्म और अर्थ का परित्याग करके, इन्द्रियों के वश में हो जाता है, शीघ्र ही ऐश्वर्य, प्राण, धन, तथा स्त्री से ही हाथ धो बैठता है।
जो अधिक धन का स्वामी होकर भी, इन्द्रियों पर अधिकार नहीं रखता, वह इन्द्रियों को वश में न रखने के कारण ही, ऐश्वर्य से भ्रष्ट हो जाता है।
मन, बुद्धि, और इन्द्रियों को अपने अधीन कर, अपने से ही अपने आत्मा को जानने की इच्छा करे, क्योंकि आत्मा ही अपना बन्धु, और आत्मा ही अपना शत्रु है।
जिसने स्वयं अपने आत्मा को जीत लिया है, उसका आत्मा ही उसका बन्धु है। वही सच्चा बन्धु, और वहीं नियत शत्रु है।
राजन्! जिस प्रकार सूक्ष्म छेद वाले जाल में फँसी हुई, दो बड़ी-बड़ी मछलियाँ, मिलकर जाल को काट डालती हैं, उसी प्रकार ये काम और क्रोध, दोनों विशिष्ट ज्ञान को लुप्त कर देते है।
जो इस जगत में धर्म तथा अर्थ का विचार करके, विजय साधन - सामग्री का संग्रह करता है, वही उस सामग्री से युक्त होने के कारण, सदा सुख पूर्वक, समृद्धिशाली होता रहता है।
जो चित्त के विकारभूत, पाँच इन्द्रिय रूपी भीतरी शत्रुओं को जीते बिना ही, दूसरे शत्रुओं को जीतना चाहता है, उसे शत्रु पराजित कर देते हैं।
इन्द्रियों पर अधिकार न होने के कारण, बड़े-बड़े साधु भी अपने कर्मो से, तथा राजा लोग राज्य के भोग विलासों से, बँधे रहते हैं।
पापाचारी दुष्टों का त्याग न करके, उनके साथ मिले रहने से, निरपराध सज्जनों को भी उनके समान ही दण्ड प्राप्त होता है, जैसे सूखी लकड़ी में मिल जाने से गीली भी जल जाती है, इसलिये दुष्ट पुरुषों के साथ कभी मेल न करे।
जो पाँच विषयों की ओर दौड़ने वाले, अपने पाँच इन्द्रिय रूपी शत्रुओं को, मोह के कारण वश में नहीं करता, उस मनुष्य को विपत्ति ग्रस लेती है।
गुणों में दोष न देखना, सरलता, पवित्रता, सन्तोष, प्रिय वचन बोलना, इन्द्रियदमन, सत्यभाषण, तथा अच्चलता - ये गुण दुरात्मा पुरुषों में नहीं होते।
भारत! आत्मज्ञान, अक्रोध, सहनशीलता, धर्मपरायणता, वचनकी रक्षा, तथा दान - ये गुण अधम पुरुषो में नहीं होते।
मूर्ख मनुष्य, विद्वानों को गाली, और निन्दा से कष्ट पहुँचाते हैं। गाली देने वाला पाप का भागी होता है, और क्षमा करने वाला पाप से मुक्त हो जाता है।
दुष्ट पुरुषों का बल है हिंसा, राजाओं का बल है दण्ड देना, स्त्रियों का बल है सेवा, और गुणवानों का बल है क्षमा।
राजन्! वाणी का पूर्ण संयम, तो बहुत कठिन माना ही गया है, परंतु विशेष अर्थ युक्त, और चमत्कार पूर्ण वाणी भी अधिक नहीं बोली जा सकती।
राजन्! मधुर शब्दों में कही हुई बात, अनेक प्रकार से कल्याण करती है, किंतु वही यदि कटु शब्दों में कही जाय, तो महान् अनर्थ का कारण बन जाती है।
बाणों से बींधा हुआ, तथा फरसे से काटा हुआ वन भी पनप जाता है, किंतु कटु वचन कहकर, वाणी से किया हुआ भयानक घाव नहीं भरता।
कर्णि, नालीक, और नाराच नामक बाणों को, शरीर से निकाल सकते हैं, परंतु कटु वचन रूपी काँटा नहीं निकाला जा सकता, क्योंकि वह हृदय के भीतर धँस जाता है।
वचन रूपी बाण, मुख से निकल कर दूसरों के मर्म पर ही चोट करते हैं, उनसे आहत मनुष्य रात-दिन घुलता रहता है, अतः विद्वान् पुरुष दूसरो पर उनका प्रयोग न करे।
देवता लोग जिसे पराजय देते हैं, उसकी बुद्धि को पहले ही हर लेते हैं, इससे वह नीच कर्म पर ही अधिक दृष्टि रखता है।
विनाशकाल उपस्थित होने पर, बुद्धि मलिन हो जाती है, फिर तो न्याय के समान प्रतीत होने वाला अन्याय, हृदय से बाहर नहीं निकलता।
भरतश्रेष्ठ! आपके पुत्रो की वह बुद्धि पाण्डवों के प्रति विरोध से व्याप्त हो गयी है, आप इन्हें पहचान नहीं रहे हैं।
महाराज धृतराष्ट्र! जो राज लछणों से सम्पन्न होने के कारण, त्रिभुवन का भी राजा हो संकता है, वह आपका आज्ञाकारी, युधिष्ठिर ही इस पृथ्वी का शासक होने योग्य है।
वह धर्म तथा अर्थ के तत्त्व को जानने वाला, तेज और बुद्धि से युक्त, पूर्ण सौभाग्यशाली, तथा आपके सभी पुत्रो से बढ़-चढ़कर है।
राजेन्द्र! धर्मधारियों में श्रेष्ठ युधिष्ठिर, दया, सौम्यभाव, तथा आपके प्रति गौरव बुद्धि के कारण, बहुत कष्ट सह रहा है।
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