वशमें न होनेके कारण, विषयों में रमने वाली इन्द्रियों से, यह संसार उसी भाँति कष्ट पाता है, जैसे सूर्य आदि ग्रहों से नक्षत्र तिरस्कृत हो जाते हैं।
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