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विदुर नीति • अध्याय 2 • श्लोक 24
सुपुष्मितः स्यादफल: फलितः स्याद् दुरारुहः । अपक्रः पक्कसंकाशो न तु शीर्येत कहिचित् ॥
राजा वृक्ष की भाँति अच्छी तरह फूलने ( प्रसन्न रहने) पर भी फल से खाली रहे, (यानि अधिक देने वाला न हों), यदि फल से युक्त, (देने वाला) हो, तो भी जिस पर चढ़ा न जा सके, ऐसा (यानि पहुँच के बाहर) होकर रहे । कच्चा (यानि कम शक्ति वाला) होने पर भी पके (यानि शक्ति सम्पन्न) की भाँति, अपने को प्रकट करे, ऐसा करने से वह नष्ट नहीं होता।
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