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विदुर नीति • अध्याय 2 • श्लोक 57
आत्मानमेव प्रथमं देशरूपेण यो जयेत् । ततोऽमात्यानमित्रांश्च न मोघं विजिगीषते ॥
जो पहले इन्द्रियों सहित मन को ही शत्रु समझकर जीत लेता है, उसके बाद, यदि वह मन्त्रियों तथा शत्रुओं को जीतने की इच्छा करे, तो उसे सफलता मिलती है।
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