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विदुर नीति • अध्याय 2 • श्लोक 26
यस्मात्त्रस्यन्ति भूतानि मृगव्याधान्मृगा इव । सागरान्तामपि महीं लब्ध्वा स परिहीयते ॥
जैसे व्याघ्र से हिरण भयभीत होता है, उसी प्रकार जिससे समस्त प्राणी डरते हैं, वह समुद्र पर्यन्त, पृथ्वी का राज्य पाकर भी, प्रजाजनों के द्वारा त्याग दिया जाता है।
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