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विदुर नीति • अध्याय 2 • श्लोक 67
समवेक्ष्येह धर्मार्थौ सम्भारान्योऽधिगच्छति । स वै सम्भृत सम्भारः सततं सुखमेधते ॥
जो इस जगत में धर्म तथा अर्थ का विचार करके, विजय साधन - सामग्री का संग्रह करता है, वही उस सामग्री से युक्त होने के कारण, सदा सुख पूर्वक, समृद्धिशाली होता रहता है।
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