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विदुर नीति • अध्याय 2 • श्लोक 80
वाक्सायका वदनान्निष्पतन्ति यैराहतः शोचति रत्र्यहानि । परस्य नामर्मसु ते पतन्ति तान्पण्डितो नावसृजेत्परेषु ॥
वचन रूपी बाण, मुख से निकल कर दूसरों के मर्म पर ही चोट करते हैं, उनसे आहत मनुष्य रात-दिन घुलता रहता है, अतः विद्वान् पुरुष दूसरो पर उनका प्रयोग न करे।
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